गणेश उत्सव 25 सितंबर तक:कुबेर देव घमंड के कारण भगवान शिव को दिखाना चाहते थे अपना वैभव, जानिए गणेश जी ने कैसे तोड़ा उनका घमंड
Published at : 2026-09-21 23:00:00
देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर देव के पास असीम धन-संपत्ति थी। धीरे-धीरे इस अपार धन के कारण उनके मन में अहंकार आ गया। उन्हें लगने लगा कि वे किसी भी चीज को हासिल कर सकते हैं और किसी को भी संतुष्ट कर सकते हैं। इसी घमंड में वे एक दिन भगवान शिव के पास कैलाश पहुंचे और अभिमान के साथ बोले, "हे प्रभु! मैं चाहता हूं कि आप अपने पूरे परिवार के साथ मेरे महल पधारें और मेरे द्वारा आयोजित भव्य भोज का आनंद लें।" भगवान शिव तुरंत समझ गए कि कुबेर के इस निमंत्रण के पीछे श्रद्धा नहीं बल्कि अपनी संपत्ति का दिखावा करने का अहंकार है। शिव जी ने बहुत ही शांत भाव से कहा, "कुबेर, मेरे जैसे संन्यासी के लिए ऐसे भव्य आयोजन का कोई अर्थ नहीं है। बेहतर होगा कि तुम यह भोजन किसी जरूरतमंद और भूखे व्यक्ति को कराओ, उससे तुम्हें सच्चा पुण्य मिलेगा।" कुबेर का अहंकार उन पर हावी था। वे बोले, "प्रभु, मैं तो रोज हजारों लोगों को खाना खिलाता हूं। मेरे लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि आज आपका परिवार मेरे वैभव का आतिथ्य स्वीकार करे।" कुबेर के इस घमंड को तोड़ना आवश्यक हो गया था। शिव जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "ठीक है, मैं स्वयं तो नहीं आ सकता, लेकिन तुम मेरे छोटे पुत्र गणेश को अपने साथ ले जा सकते हो। बस एक बात का ध्यान रखना, गणेश को भूख बहुत लगती है और वह आसानी से तृप्त नहीं होता।" कुबेर ने बड़े गर्व से कहा, "आप चिंता न करें, मेरे पास अन्न और धन का कोई अंत नहीं है। मैं गणेश जी को अवश्य तृप्त कर दूंगा।" कुबेर बाल गणेश को लेकर अपने भव्य महल पहुंचे। उन्होंने रसोईघर में तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनवाए और गणेश जी को परोसना शुरू किया। गणेश जी ने भोजन करना प्रारंभ किया। वे एक के बाद एक पकवान खाते जा रहे थे, पर उनकी भूख शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी। देखते ही देखते महल के सभी बर्तन खाली हो गए। रसोइयों ने जितना भोजन बनाया था, सब खत्म हो गया। यहां तक कि कुबेर के अन्न के विशाल भंडार भी पूरी तरह खाली हो गए, लेकिन गणेश जी की भूख मिटने का नाम नहीं ले रही थी। वे मुस्कुराते हुए और भोजन मांगने लगे। यह देखकर कुबेर के हाथ-पांव फूल गए। उन्हें अपनी लाचारी का एहसास हुआ कि उनका सारा धन और संसाधन मिलकर भी एक छोटे बालक की भूख शांत नहीं कर सके। निराश और लज्जित होकर कुबेर दौड़ते हुए कैलाश पहुंचे और शिव जी के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार करते हुए रोते हुए कहा, "प्रभु! मुझे बचा लीजिए, मेरा सारा घमंड चूर-चूर हो गया है।" तभी गणेश जी भी वहां पहुंच गए। माता पार्वती ने अत्यंत प्रेम और वात्सल्य से एक छोटा सा मोदक गणेश जी को दिया। माता के हाथ से प्रेमपूर्वक दिया गया वह छोटा सा मोदक खाते ही गणेश जी का पेट भर गया और वे पूरी तरह तृप्त हो गए। यह देखकर कुबेर की आंखें खुल गईं। उन्हें समझ आ गया कि धन-दौलत और संसाधनों से किसी की भूख या इच्छा पूरी नहीं की जा सकती, उसके लिए प्रेम और विनम्रता की आवश्यकता होती है। कुबेर ने शिव जी और गणेश जी से क्षमा मांगी और जीवन में कभी भी अपने पद या संपत्ति का घमंड न करने का संकल्प लिया। प्रसंग की सीख सफलता का घमंड न करें: जीवन में धन, बड़ा पद या प्रसिद्धि मिलना आपकी मेहनत का परिणाम हो सकता है, लेकिन इसे अपने व्यवहार में घमंड मत बनने दीजिए। याद रखिए कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता। जो आज आपके पास है, वह कल किसी और का हो सकता है। इसलिए सफलता मिलने पर आभारी बनिए, अहंकारी नहीं। दिखावा करने से दूर रहें: कुबेर जी भगवान शिव को अपनी संपत्ति का दिखावा करना चाहते थे। आज के समय में भी लोग केवल अपनी स्थिति का प्रदर्शन करने के लिए फिजूलखर्ची करते हैं। दिखावे के चक्कर में किया गया कोई भी काम आपको शांति नहीं दे सकता। सादगी और सच्चाई में ही वास्तविक सम्मान छिपा होता है। जरूरतमंदों की मदद करें: कथा में शिव जी ने कुबेर देव को सलाह दी थी कि वे किसी भूखे या जरूरतमंद को भोजन कराएं। सुखी जीवन का नियम यही है कि आपके पास जो भी संसाधन (धन, ज्ञान या समय) अधिक मात्रा में हैं, उनका उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करें। समाज की सेवा करने से जो खुशी मिलती है, वह किसी भी भौतिक चीज से बढ़कर है। प्रेम और भाव का महत्व समझें: गणेश जी कुबेर के विशाल अन्न भंडार से तृप्त नहीं हुए, लेकिन माता पार्वती के प्रेम से दिए गए छोटे से आहार से तृप्त हो गए। इसका अर्थ यह है कि रिश्तों और जीवन में बाहरी भाव से ज्यादा प्रेम का महत्व होता है। अपने परिवार और मित्रों के साथ जब भी व्यवहार करें, उसमें आत्मीयता रखें, पैसों का रौब नहीं। गलती स्वीकारना और क्षमा मांगना सीखें: जब कुबेर को अपनी भूल का अहसास हुआ, तो उन्होंने बिना देर किए शिव जी से क्षमा मांग ली। एक व्यक्ति वही है जो अपनी गलती को पहचाने और उसे सुधारने का साहस रखे। अपनी भूल स्वीकार करने से व्यक्ति छोटा नहीं होता, बल्कि उसका व्यक्तित्व और अधिक महान बन जाता है। संसाधनों की सीमा पहचानें: पैसा सब कुछ खरीद सकता है, यह सोचना एक बहुत बड़ी भूल है। धन से आप सुख-सुविधाएं तो जुटा सकते हैं, पर शांति, स्वास्थ्य, सच्चा सम्मान और प्रेम नहीं खरीद सकते। अपने संसाधनों पर घमंड करने के बजाय उनका उपयोग सही दिशा में करें।