Balochistan Gwadar Port: भारत को मिला था ग्वादर का ऑफर, मना करने पर पाकिस्तान ने खरीदा, अब 91 फीसदी कमाई कर रहा चीन

Balochistan Gwadar Port: भारत को मिला था ग्वादर का ऑफर, मना करने पर पाकिस्तान ने खरीदा, अब 91 फीसदी कमाई कर रहा चीन

Published at : 2026-02-02 09:36:40
बलूचिस्तान में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के लगातार हमलों ने पाकिस्तान की सेना को बड़ी चुनौती दे दी है. इन हमलों के बाद पाकिस्तानी सेना ने भी पूरे इलाके में बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किए हैं. एक बार फिर बलूचिस्तान चर्चा में है, लेकिन इसकी वजह सिर्फ हिंसा नहीं, बल्कि चीन की बढ़ती दखलअंदाजी भी है.बलूचिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा जरूर है, लेकिन कई इलाकों में हालात ऐसे हैं कि फैसले पाकिस्तान से ज्यादा चीन के हिसाब से लिए जाते हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ग्वादर पोर्ट. ग्वादर पोर्ट चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का अहम हिस्सा है और इसका संचालन चीन की कंपनी चाइना ओवरसीज पोर्ट होल्डिंग कंपनी के पास है.40 साल के लिए चीन को सौंप दियासाल 2017 में पाकिस्तान ने ग्वादर पोर्ट को 40 साल के लिए चीन को सौंप दिया. इस पोर्ट के विकास, संचालन और कमाई का बड़ा हिस्सा चीन के पास है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ग्वादर पोर्ट से होने वाली करीब 91 प्रतिशत कमाई चीन को मिलती है, जबकि पाकिस्तान को सिर्फ 9 प्रतिशत हिस्सा मिलता है. यही वजह है कि स्थानीय बलूच लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं.भारत को ग्वादर बेचने का प्रस्ताव दिलचस्प बात यह है कि ओमान के सुल्तान ने पहले भारत को ग्वादर बेचने का प्रस्ताव दिया था. कहा जाता है कि यह प्रस्ताव 1956 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास गया था, लेकिन भारत ने इसे स्वीकार नहीं किया. इसके बाद 1958 में ओमान ने ग्वादर को 30 लाख पाउंड में पाकिस्तान को बेच दिया. आज ग्वादर पोर्ट चीन के नियंत्रण में है और यही वजह है कि बलूचिस्तान में विरोध और हिंसा लगातार बढ़ रही है. ब्रिटिश सरकार की तरफ से सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि भारत में जैन समुदाय ने भी ग्वादर को खरीदने की पेशकश की थी. जैन समुदाय के पास अपार धन था और वे अच्छी कीमत दे सकते थे. इस बात का जिक्र अजहर अहमद ने अपने आर्टिकल 'Gwadar: A Historical Kaleidoscope' में किया था.कैसा था ग्वादर?ग्वादर कभी एक छोटा और शांत मछुआरों का कस्बा हुआ करता था. यहां के लोग मछली पकड़कर और छोटे व्यापार से जीवन चलाते थे, लेकिन बंदरगाह बनने के बाद भी स्थानीय लोगों को न तो रोजगार मिला और न ही विकास का फायदा. इससे गुस्सा और असंतोष बढ़ता गया. बहुत कम लोग जानते हैं कि ग्वादर हमेशा पाकिस्तान का हिस्सा नहीं था. करीब 200 साल तक यह इलाका ओमान के कब्जे में रहा. साल 1783 से लेकर 1958 तक ओमान के सुल्तान का यहां शासन था. बाद में ओमान ने ग्वादर को बेचने का फैसला किया.ये भी पढ़ें: समंदर से उठेगी तबाही: रूस का ‘कयामत का हथियार’ मिनटों में मिटा सकता है पूरे शहर