140 दिन बाद आज बंद होंगे हेमकुंड साहिब के कपाट:3.78 लाख श्रद्धालु कर चुके दर्शन, पाकिस्तान से भी 40 लोगों का जत्था पहुंचा

140 दिन बाद आज बंद होंगे हेमकुंड साहिब के कपाट:3.78 लाख श्रद्धालु कर चुके दर्शन, पाकिस्तान से भी 40 लोगों का जत्था पहुंचा

Published at : 2026-10-10 00:00:36
चमोली जिले में समुद्र तल से करीब 15,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित सिखों के पवित्र तीर्थ श्री हेमकुंड साहिब के कपाट आज शीतकाल के लिए बंद होंगे। 23 मई को कपाट खुलने के बाद अब तक 3 लाख 78 हजार 737 श्रद्धालु यहां दर्शन कर चुके हैं। कपाट बंद होने के साथ ही इस साल की यात्रा समाप्त हो जाएगी। इस मौके पर पाकिस्तान से 40 श्रद्धालुओं का जत्था भी हेमकुंड साहिब पहुंचा है। हेमकुंड साहिब में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी होती है। इससे यहां तक पहुंचने वाले रास्ते बर्फ से ढक जाते हैं। इसी कारण हर साल अक्टूबर में कपाट बंद कर दिए जाते हैं। पाकिस्तान से आए जत्थे में 10 बच्चे और 15 महिलाएं पाकिस्तान से आए 40 श्रद्धालुओं के जत्थे की अगुवाई पपिंदर सिंह कर रहे हैं। जत्थे में 10 बच्चे, 15 महिलाएं और 15 पुरुष शामिल हैं। श्रद्धालु पाकिस्तान के लाहौर, सिंध, पेशावर और ननकाना साहिब से आए हैं। जानकारी के मुताबिक, ये श्रद्धालु शारजाह के रास्ते दिल्ली पहुंचे। इसके बाद गुरुवार शाम करीब 5 बजे दिल्ली के गुरुद्वारा बंगला साहिब से रवाना हुए। रात करीब एक बजे ऋषिकेश स्थित गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब पहुंचे। यहां कुछ देर रुकने के बाद जत्था चमोली के लिए रवाना हो गया। जत्थे के श्रद्धालु गोविंदघाट पहुंचने के बाद घांघरिया होते हुए हेमकुंड साहिब के दर्शन के लिए जा रहे हैं। सभी को आगे की यात्रा घोड़े से करनी है। सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस बल भी उनके साथ चल रहा है। ये श्रद्धालु कपाट बंद होने के मौके पर धाम पहुंचकर मत्था टेकना चाहते हैं। 23 मई को खुले थे कपाट, अब तक 3.78 लाख ने किए दर्शन इस साल श्री हेमकुंड साहिब के कपाट 23 मई को श्रद्धालुओं के लिए खोले गए थे। इसके बाद से लगातार देश-विदेश के श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते रहे। अब 10 अक्टूबर को कपाट बंद होने के साथ यात्रा सीजन समाप्त हो जाएगा। इस साल अब तक 3,78,737 श्रद्धालु धाम पहुंच चुके हैं। पिछले साल हेमकुंड साहिब के कपाट 10 अक्टूबर 2025 को शीतकाल के लिए बंद किए गए थे। पिछले यात्रा सीजन में करीब 2.7 लाख श्रद्धालुओं ने दर्शन किए थे और यात्रा 139 दिनों तक चली थी। हेमकुंड साहिब तक पहुंचना आसान नहीं है। श्रद्धालु पहले सड़क मार्ग से चमोली जिले के गोविंदघाट पहुंचते हैं। यहां से घांघरिया तक करीब 13 किलोमीटर का रास्ता है। इसके बाद लगभग 6 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पार कर धाम पहुंचा जाता है। ऊंचाई, कम ऑक्सीजन और मौसम में अचानक बदलाव के कारण यात्रा चुनौतीपूर्ण रहती है। तय तारीख पर बंद होते हैं कपाट, बर्फबारी मुख्य वजह शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के सदस्य गुरचरण सिंह ग्रेवाल के मुताबिक, हेमकुंड साहिब के कपाट बंद करने की तारीख पहले से निर्धारित रहती है। ऊंचाई वाले क्षेत्र में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी होती है। इससे रास्ते बंद हो जाते हैं और श्रद्धालुओं की आवाजाही मुश्किल हो जाती है। इसी कारण हर साल तय समय पर कपाट बंद किए जाते हैं। कपाट बंद करने की प्रक्रिया में धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है। अरदास और अन्य अनुष्ठानों के बाद गुरु ग्रंथ साहिब के पावन स्वरूप को पालकी साहिब में नीचे लाया जाता है। इसके बाद इसे ऋषिकेश में स्थित श्री हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे में शीतकाल के लिए विराजमान किया जाता है। सर्दियों में हेमकुंड साहिब का क्षेत्र बर्फ से ढका रहता है और यात्रा बंद रहती है। अगले साल गर्मियों में कपाट खुलने के बाद श्रद्धालु फिर से दर्शन कर सकेंगे। बचित्र नाटक में मिलता है हेमकुंड साहिब का उल्लेख हेमकुंड साहिब की धार्मिक मान्यता सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह की रचना ‘बचित्र नाटक’ से जुड़ी है। इसमें गुरु साहिब ने अपने पूर्व जन्म में एक ऐसे स्थान पर तपस्या करने का उल्लेख किया है, जो सात पर्वत चोटियों से घिरा था। इसी वर्णन के आधार पर बाद में हिमालय में उस स्थान की खोज की गई। लंबे समय तक इस धार्मिक स्थल की वास्तविक भौगोलिक स्थिति स्पष्ट नहीं थी। वर्ष 1884 में विद्वान पंडित तारा सिंह नरोत्तम ने अपनी पुस्तक ‘श्री गुर तीरथ संग्रह’ में बद्रीनाथ क्षेत्र के पास स्थित लोकपाल झील को गुरु साहिब के वर्णित तपस्थल से जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि, उस समय दुर्गम रास्तों और सीमित साधनों के कारण इसकी पहचान व्यापक रूप से स्थापित नहीं हो सकी। संत सोहन सिंह ने मोदन सिंह के साथ मिलकर यहां पर एक छोटा गुरुद्वारा बनवाया। संत सोहन सिंह ने 1934 में की थी स्थल की पहचान वर्ष 1929 में सिख विद्वान भाई वीर सिंह की पुस्तक ‘श्री कलगीधर चमत्कार’ प्रकाशित हुई। इसमें हेमकुंड साहिब के वर्णन ने संत सोहन सिंह को इस स्थान की खोज के लिए प्रेरित किया। संत सोहन सिंह ने 1933 में हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों की यात्रा शुरू की और स्थानीय लोगों से जानकारी जुटाते हुए लोकपाल झील तक पहुंचने का प्रयास किया। वर्ष 1934 में उन्होंने उस झील की पहचान गुरु गोबिंद सिंह के वर्णन में बताए गए तपस्थल के रूप में की। इसके बाद वहां गुरुद्वारा बनाने का प्रयास शुरू हुआ। भाई वीर सिंह ने इस कार्य के लिए आर्थिक सहायता दी। ब्रिटिश भारतीय सेना की इंजीनियरिंग इकाई बंगाल सैपर्स से जुड़े हवलदार मोदन सिंह भी इस काम से जुड़े। वर्ष 1936 में झील के किनारे पत्थरों से एक छोटा गुरुद्वारा बनाया गया। वर्ष 1937 में वहां पहली बार गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश हुआ। इसके बाद हेमकुंड साहिब एक प्रमुख सिख तीर्थस्थल के रूप में विकसित होता गया। सर्दियों में बर्फ से ढक जाता है पूरा क्षेत्र हेमकुंड साहिब समुद्र तल से करीब 15,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसके आसपास सात पर्वत चोटियां और एक हिमनदीय झील है। सर्दियों में यहां भारी बर्फबारी होती है, जिससे पैदल मार्ग बर्फ से ढक जाते हैं। अत्यधिक ठंड और कम ऑक्सीजन के कारण इस क्षेत्र में सामान्य आवाजाही भी मुश्किल हो जाती है। यात्रा शुरू होने से पहले भारतीय सेना और गुरुद्वारा प्रबंधन से जुड़े सेवादार मार्ग से बर्फ हटाने का काम करते हैं। इसके बाद प्रशासन और संबंधित संस्थाएं श्रद्धालुओं की सुरक्षित आवाजाही के लिए व्यवस्थाएं करती हैं। गर्मियों में कपाट खुलने के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। ----------------- ये खबर भी पढें… उत्तराखंड के बर्फीले पहाड़ों में छिपी थी गुरु की तपस्थली:एक ग्रंथ, एक फौजी और 100 साल की खोज से मिला हेमकुंड साहिब समुद्र तल से करीब 15,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित श्री हेमकुंड साहिब आज सिख समुदाय के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में गिना जाता है। हर साल हजारों श्रद्धालु दुर्गम पहाड़ी रास्तों को पार कर यहां पहुंचते हैं। इस साल यात्रा शुरू होने के बाद अब तक 26,500 से ज्यादा श्रद्धालु हेमकुंड साहिब पहुंच चुके हैं। (पढ़ें पूरी खबर)